No Nobel Prize for Mahatma Gandhi - Sukanya Naresh Kadyan

http://socialentrepreneurship.change.org/actions/view/no_nobel_priz...
Mohandas Gandhi (1869-1948) has become the strongest symbol of non-violence in the 20th century. It is widely held – in retrospect – that the Indian national leader should have been the very man to be selected for the Nobel Peace Prize. He was nominated several times, but was never awarded the prize. Why?

These questions have been asked frequently: Was the horizon of the Norwegian Nobel Committee too narrow? Were the committee members unable to appreciate the struggle for freedom among non-European peoples?" Or were the Norwegian committee members perhaps afraid to make a prize award which might be detrimental to the relationship between their own country and Great Britain?

Gandhi was nominated in 1937, 1938, 1939, 1947 and, finally, a few days before he was murdered in January 1948. The omission has been publicly regretted by later members of the Nobel Committee; when the Dalai Lama was awarded the Peace Prize in 1989, the chairman of the committee said that this was "in part a tribute to the memory of Mahatma Gandhi". However, the committee has never commented on the speculations as to why Gandhi was not awarded the prize, and until recently the sources which might shed some light on the matter were unavailable. Gandhian Ideologist and Philosopher Naresh Kadyan, animal rights activist comes forward to raise this issue before you all to support please.

Gandhi wrote a letter to Adolf Hitler concerning World War - 2 (Thank you dear Ge Araceli)

http://nobelprize.org/nobel_prizes/

http://www.care2.com/news/member/576059368/1272564

Nobel Prize for Mahatma Gandhi

http://nobelprize.org/nobel_prizes/peace/articles/gandhi/index.html

http://www.care2.com/c2c/share/detail/1272555

गांधी जी के बहुत से प्रशंसकों को शांति का नोबेल पुरस्कार मिल चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को यह अभी-अभी मिला है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल आज भी यही बना हुआ है कि पांच बार नामांकित किए जाने के बावजूद यह पुरस्कार अहिंसा और शांति की प्रतिमूर्ति महात्मा गांधी को क्यों नहीं मिला ?

हालांकि तीन बार गांधी जी के नाम का चयन किया गया, लेकिन हर बार चयन समितियों ने अलग-अलग कारण बताकर उन्हें यह पुरस्कार नहीं मिलने दिया। चयन समितियों ने गांधी जी को नोबेल न मिलने के कई कारण बताए जैसे कि 'वह अत्यधिक भारतीय राष्ट्रवादी थे' और वह 'बार-बार ईसा [शांति दूत] के रूप में सामने आते थे, लेकिन अचानक से साधारण राजनीतिज्ञ बन जाते थे। एक समिति का विचार था कि 'गांधी असल राजनीतिज्ञ या अंतरराष्ट्रीय कानून के समर्थक नहीं थे, न ही वह प्राथमिक तौर पर मानवीय सहायता कार्यकर्ता थे तथा न ही अंतरराष्ट्रीय शांति कांग्रेस के आयोजक थे।'

गांधी जी ने विश्व को यह दिखाया कि कि सत्याग्रह के जरिए कुछ भी हासिल किया जा सकता है। उन्हें नोबेल पुरस्कार के लिए 1937, 1938, 1939, 1947 और अंत में जनवरी 1948 में शहादत से पहले नामांकित किया गया। नोबेल फाउंडेशन के अनुसार गांधी को 1937 में जब पहली बार नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया तो चयन समिति के सलाहकार प्रोफेसर जैकब वोर्म मुलर ने उनके बारे में आलोचनात्मक टिप्पणी की। जैकब ने अपनी टिप्पणी में कहा कि नि:संदेह वह [गांधी] अच्छे, आदर्श और तपस्वी व्यक्ति हैं। एक ऐसे व्यक्ति हैं जो सम्मान के योग्य हैं और लोग जिन्हें प्यार करते हैं, लेकिन उनकी नीतियों में कुछ ऐसे मोड़ हैं जिनकी उनके अनुयायी भी मुश्किल से संतोषजनक व्याख्या कर पाते हैं। वह एक स्वतंत्रता सेनानी और एक तानाशाह हैं, एक आदर्शवादी और राष्ट्रवादी। वह बारबार शांति दूत के रूप में उभरकर सामने आते हैं, लेकिन अचानक से एक साधारण राजनीतिज्ञ बन जाते हैं।

वोर्म मुलर ने अपनी टिप्पणी में यह भी कहा कि गांधी जी 'सुसंगत रूप से शांतिवादी' नहीं थे और उन्हें यह पता रहा होगा कि ब्रिटिश शासन के खिलाफ उनके कुछ अहिंसक आंदोलन हिंसा और आतंक में बदल जाएंगे। उन्होंने यह टिप्पणी 1920-1921 में गांधी जी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन के संदर्भ में की जब भीड़ ने चौरीचौरा में एक पुलिस थाने को जला दिया था और कई पुलिसकर्मियों को मार दिया तब दी थी। मुलर ने चयन समिति को सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में कहा था कि गांधी अत्यधिक भारतीय राष्ट्रवादी थे। उनके बारे में कहा जा सकता है कि दक्षिण अफ्रीका में उनका संघर्ष सिर्फ भारतीयों की ओर से था, न कि उन अश्वेतों की ओर से जिनकी हालत अत्यंत दयनीय थी। गांधी जी को नोबेल के लिए 1938 और 1939 में भी नामांकित किया गया, लेकिन दूसरी बार उनके नाम का चयन भारत के आजाद होने के बाद 1947 में किया गया।

स्वतंत्रता सेनानी गोविन्द वल्लभ पंत बीजी खेर उन व्यक्तियों में शामिल थे जिन्होंने उन्हें नामांकित किया। उस समय नोबेल समिति के तत्कालीन सलाहकार जेन्स अरुप सीप की रिपोर्ट हालांकि उतनी आलोचनात्मक नहीं थी जितनी कि वोर्म मुलर की थी। हालांकि उस समय समिति के अध्यक्ष गुनर जान ने अपनी डायरी में लिखा कि यह बात सच है कि नामांकित व्यक्तियों में गांधी सबसे बड़ी हस्ती हैं। उनके बारे में बहुत सी अच्छी चीजें कही जा सकती हैं, हमें यह भी याद रखना चाहिए कि गांधी सिर्फ शांति तपस्वी ही नहीं, वरन सर्वप्रथम और अग्रिम मोर्चे पर वह एक देशभक्त हैं।

जान ने कहा कि इसके अतिरिक्त हमें यह बात भी दिमाग में रखनी चाहिए कि गांधी भोले-भाले नहीं हैं। वह एक दक्ष न्यायविद और वकील हैं। गांधी जी को 11 साल में तीसरी बार 1948 में चयनित किया गया, लेकिन इसी वर्ष जनवरी में उनकी हत्या हो गई। इस घटना के चलते नोबेल समिति इस माथापच्ची में लग गई कि उन्हें मरणोपरांत नोबेल पुरस्कार दिया जाए या नहीं।

गांधी जी को 1948 में यह पुरस्कार इसलिए नहीं मिल पाया। क्योंकि नोबेल समिति ने यह कहकर इस साल किसी को भी पुरस्कार नहीं देने का फैसला किया कि इसके लिए कोई 'योग्य जीवित उम्मीदवार' नहीं है। समिति के सलाहकार सीप ने गांधी जी के जीवन के अंतिम पांच महीनों में उनकी गतिविधियों पर एक रिपोर्ट लिखी। उन्होंने लिखा कि गांधी ने जीवनभर आदर्शो के जरिए अपने काम और राजनीति में जिस तरह की अमिट छाप छोड़ी, वह देश और देश के बाहर बहुत से लोगों के लिए प्रेरणा के रूप में काम करती रहेगी।

इस संदर्भ में गांधी की तुलना सिर्फ धर्म संस्थापकों से की जा सकती है। समिति ने किसी को मरणोपरांत नोबेल पुरस्कार देने की संभावना की तलाश की, लेकिन वह खुद संदेहों से घिरी थी। उस समय नोबेल फाउंडेशन के नियमों के अनुसार विशेष परिस्थितियों में किसी को मरणोपरांत नोबेल पुरस्कार दिया जा सकता था, इसलिए गांधी जी को यह पुरस्कार दिया जाना संभव था, लेकिन गांधी किसी संगठन से संबंधित नहीं थे।

रिपोर्ट में लिखा गया कि गांधी ने कोई संपत्ति और वसीयत नहीं छोड़ी। उनके मरणोपरांत पुरस्कार राशि किसे दी जाए, इस बारे में पुरस्कार प्रदाता स्वीडिश संस्थानों ने चर्चा की, लेकिन उत्तर नकारात्मक रहा। उन्होंने सोचा कि मरणोपरांत पुरस्कार तभी दिया जा सकता है जब विजेता का निधन समिति के फैसले के बाद हो।

नरेश कादियान, अध्यक्ष - पीपल्स फॉर एनिमल हरियाणा

-http://nareshkadyan.blogspot.com/

अंतरराष्ट्रीय पशु रक्षा संगठन के भारतीय प्रतिनिधि

Naresh Kadyan http://nareshkadyan.webs.com/

Representative of the International Organization for Animal Protection in India,
http://www.oipa.org/oipa/news/oipaindia.html
Chairman, PFA Haryana http://www.pfaharyana.in
+91-9813010595 , +91-9313312099
http://nareshkadyanbook.blogspot.com/

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Comment by Naresh Kadyan on January 12, 2010 at 5:51pm
Thanx a ton Sir George Willston ji.............
With best wishes,
Naresh Kadyan
Comment by George Williston on January 12, 2010 at 5:39pm
Yes and Barack Obama was awared the Nobel Peace prize just before he escalated the war in Afghanistan, justifying war in his acceptance speech for the peace award. It was very disheartening to me. I had also hoped to much more out him. but what we got was a wolf in sheeps clothing. It should be expected as so much wealth was given to him to win the election. but he gave great speeches that would reflect a lot of heart to bad they were only bullshit. I shall enjoy getting to know you. I have great interest in India and what its legecy brings to the world, God is Love, as expressed by many great saints of India.

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